Sunday, November 13, 2011

Sheesha

ग़म की नदियाँ जब सूख जाए
आंसू भी प्यार से डरे
बादलों में छिपी तेरी उस मुस्कुराहट,
ओस की बरसात जैसे बिखरे

स्थिर जल में खुशियों के नाव चलें
मोड़ दे लेहेरों की हर दिशा
आँखों में तेरी मोहब्बत के दीप
अब तो बस होना है नशा

वादियों के ठंडे झोंके
मेरे रूह के प्यास बुझाये
पिघलती बरफ ने तुझे ओझल किया
ये फिर से क्यूँ है ग़म छाए?

मिलन की धूप का उदय होगा
तन्हाई में कभी न कटेंगी ये बरसात
हवाओं में वो भीनी सी महक तेरी
रहेगा हमेशा मेरे ही साथ

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